कोरोना और उसके बाद का भारत
क्या कोरोना काल के बाद हम फिर से पुराने ज़माने में लौट जाएंगे। आज सड़कों पर और बाज़ारों में भीड़ कम होने लगी है। वाहन भी कम दिख रहे हैं। वायु और ध्वनि प्रदूषण भी कम हो गया है। पशु पक्षी भी शाहर की और आने लगे हैं जैसे आज से साथ साल पहले मैंने देखे थे.
ऐसी स्थिति की उम्मीद किसी ने नही की होगी, लेकिन फिर भी ये बदलाव मुझे अच्छा लग रहा है और बचपन के दिन याद आ रहे हैं।
1951 में भारत की आबादी 36 करोड़ थी और सड़के, बाज़ार, मोहल्ले सब खाली खाली होते थे। वाहन के नाम पर तांगा होता था जस में घोड़ा जुता होता था। सामान ढोने के लिए बैलगाड़ी जिसे दो बैल खींचते थे। कोई शोर नही कोई धुआ नही।
1951 में म्युनिसिपेलिटी के स्कूल में मुझे सीधा पहली क्लास में भर्ती करवाया गया था। उस समय नर्सरी, LKG, HKG जैसी बात नही होती थी। इसीलिए 1961 में 14 साल की उम्र में मैंने दसवीं या हाई स्कूल पास कर लिया था।
हां तो उन दिनों परम्परा थी पट्टी पूजन की। स्कूल में हमारी भी पट्टी पूजी गई थी, कैसे पूजी गई थी ये तो याद नहीं, लेकिन पूरी क्लास में बतासे बांटे गए थे, ये मुझे याद है।
उस समय जब भी बच्चे को पहली बार स्कूल में भर्ती करवाया जाता था तो क्लास में या पूरे स्कूल में बतासे बंटवाए जाते थे।
स्कूल घर से करीब एक किलोमीटर दूर होगा, सब बच्चे पैदल ही जाते थे।
पहली क्लास में कागज़ पर नही, लकड़ी की पट्टी पर लिखना सिखाया जाता था। इसीलिए पट्टी पूजी जाती थी।
बाजार में दो तरह की पट्टियां मिलती थीं।
एक होती थी पेंट की हुई जिस पर सरकण्डे की कलम से, सफेद खड़िया से लिखा जाता था।
दूसरी पट्टी या तख्ती होती थी बिना पेंट की। उस पर मुल्तानी मिट्टी से लेप किया जाता था और सूखने के बाद कलम और काली स्याही से लिखा जाता था। पिताजी ने मुझे ऐसी ही पट्टी दिलवाई थी।
पट्टी के एक तरफ अक्षर जैसे अ आ इ ई, क ख ग घ लिखा जाता था तथा दूसरी तरफ गिनती 1 से 100 तक।
अधिकतर बच्चे पेंट की हुई पट्टी पर खड़िया से लिखते थे। खड़िया घोल कर जिस पात्र में ले जाते थे उसे बुद्दका कहते थे। बुद्दका पोर्सलीन या चीनी मिट्टी का बना होता था। इसकी बनावट ऐसी कि अगर लुढ़क भी जाए तो भी खड़िया बाहर न फैले। इस पर ढक्कन नही होता था।
स्याही की दवात टिन की बनी होती थी, बिना ढक्कन की। लाल, हरी, नीली, पीली कई रंगों में ये दवात आती थी और बड़ी सुंदर लगती थी।
दूसरी तीसरी क्लास में हमें तकली से सूत कातना भी सिखाया जाता था. देश चार साल पहले ही आज़ाद हुआ था और गांधी जी चरखे पर सूट काटा करते थे इस लिए बच्चों को भी सूत कातना सिखाते थे. सूत जो धागे की तरह होता था, लकड़ी की एक विशेष आकार की पट्टी, जिसे अटेरन कहते थे, पर लपेट कर क्लास रूम की दीवार पर टांग दिया जाता था. मेरी अटेरन भी क्लास रूम में टांग दी गईमई. उस समय मैं तीसरी क्लास में आ गया था. तीसरी क्लास पास करने के बाद पिता जी का ट्रान्सफर आगरा में ही दुसरे स्टेशन पर हो गया और मेरी अटेरन पुराने स्कूल में ही रह गई जिस की याद मुझे अक्सर आ जाती थी.
आगरा का जो ये दूसरा स्टेशन था वो यात्री स्टेशन न हो कर एक Transhipment yard था. यहाँ पर छोटी लाइन Meter gauge और बड़ी लाइन या Broad gauge दोनों थीं. बिहार से कोयला बड़ी लाइन की माल गाड़ियों में आता था और उन डिब्बों से मजदूर वो कोयला साथ में खड़ी छोटी लाइन की गाड़ी के डिब्बों में भरते थे. ये छोटी लाइन की गाडी उस कोयले को राजस्थान में ले जाती थी. इसी प्रकार छोटी लाइन की गाडी में जिप्सम, जो एक सफ़ेद मिटटी होती है भर कर राजस्थान से आती थी उसको उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ भेजा जाता था. जिप्सम सीमेंट बनाने में काम आती थी.
रेलवे कॉलोनी इस यार्ड के दूसरी और बसी हुई थी और स्कूल जाने के लिए हम बच्चों को रेलवे यार्ड पार कर के जाना पड़ता था. कई बार हम मालगाड़ियों के डब्बों के नीचे से निकलते थे. जब मैं पांचवीं क्लास में आ गया तो छोटे बच्चों का मैं लीडर बन गया. छोटे बच्चों को यार्ड पार करना मेरी जिम्मेदारी होती थी और जब मेरा किसी बच्चे से झगड़ा हो जाता था तो मैं कह देता था, कल तुमको स्कूल नहीं ले जाऊँगा. अब वो बच्च अपने मान से जा कर कहता था और उसकी माँ मुझे आ कर कहती थी क्या हो गया कु्क्कू और मुझे मना कर हमारा समझोता करा देती थी.
पांचवीं क्लास पास कर के मैंने इंटर कॉलेज में एडमिशन लिया. उत्तर प्रदेश में जिसे इंटर कॉलेज कहा जाता है उसे राजस्थान में सीनियर सेकेंडरी स्कूल कहते हैं.
ये नया स्कूल घर से करीब चार किलोमीटर दूर था और मैं पैदल ही स्कूल जाता था. उस समय आज की तरह ऑटो रिक्शा नहीं होते थे और साइकिल रिक्शा से बच्चे को स्कूल भेजना आम आदमी के बस की बात नहीं होती थी. स्कूटर तो थे ही नहीं और मोटर साइकिल बहुत पैसे वालों के पास या एंग्लो इंडियन के पास होती थी जो अब भी थोड़ी संख्या में देश में रह गए थे. बाद में ये लोग इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया चले गये थे.
उन दिनों आदमी बहुत महनती होता था. मुझे आज भी याद है हमारी कॉलोनी के पीछे गाँव था वहां का किसान एक बड़ी टोकरी में सब्जिया
लेकर पैदल चल कर करीब पांच किलोमीटर दूर सब्जीमंडी में बेच कर आता था. उसकी टोकरी में तीस किलो से ज्यादा सब्जियां होती थीं. आजकल हम एक किलो मीटर भी पैदल चलना पसंद नहीं करते.
कोरोना के चलते अब शादियों में ज्यादा भीड़ न करने की बातें हो रही हैं. उस ज़माने में एक शादी में बारातीऔर घराती मिला कर भी पचास साठ लोगों से ज्यादा नहीं होते थे. अब वही ज़माना लौटता दिखाई दे रहा है.
वैसे भी इस लॉक डाउन के बाद देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने वाली है इसलिए फिजूल खर्ची बंद हो जाएगी.