Wednesday, 20 September 2017

कभी कभी सोचता हूँ आदमी किस लिए इस दुनिया में आता है, किस लिए जीता है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है. क्या भौतिक सुख सुविधाएं भोगने वाले व्यक्ति का जीवन सफल है या उस व्यक्ति का जो अपने सिद्धांतों के लिए लड़ता है और उनकी रक्षा के लिए अपने सुख सुविधा और जीवन कुर्बान कर देता है.
क्या वही  व्यक्ति सफल है जो जीवन में खूब धन संपदा एकत्रित करता है, खुद भी सुखपूर्वक जीता है और बाद में उसकी संतान उसके द्वारा छोड़ी हुई धन संपदा के सहारे सुख भोगते हैं या वो आदमी सफल है जिस के मरने के बाद लोग उसका ससम्मान नाम लेते हैं.
महाराणा प्रताप और मानसिंह को ले लेते हैं. महाराणा प्रताप ने अकबर की आधीनता कभी  नहीं स्वीकारी और जीवनपर्यंत अकबर से लड़ते रहे. उन्होंने इस के लिए अपार कष्ट उठाये और जंगलों में रहने व घास की रोटी खाने तक को मजबूर हुए.
दूसरी और आमेर के राजा मान सिंह थे जिन्होंने अकबर से समझौता कर लिया और अकबर के सेनापति बन गए. आज चार सौ साल बाद भी लोग महाराणा प्रताप का नाम जितने आदर और सम्मान से लेते हैं उतना मान सिह का नहीं.
दूसरा उदाहरण रानी झाँसी या लक्ष्मीबाई का है. रानी लक्ष्मी बाई अपने पति गंगाधर राव की म्रत्यु के बाद झाँसी की रानी बनी. इस वीरांगना ने अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं की और मात्र 23 वर्ष की उम्र में अंग्रेजो से लड़ते हुए शहीद हो गई. झांसी का किला आज भी विद्यमान है लेकिन खँडहर जैसा ही है.
झांसी के पड़ोस में ही ग्वालियर है, जहाँ के राजा थे जीवाजी राव सिंधिया. सिंधियाओं ने अंग्रेजों की आधीनता स्वीकार कर ली और ग्वालियर पर1956 तक राज किया. ग्वालियर का किला और जीवाजी राव सिंधिया का महल देखने लायक है जिस में बहुमूल्य वस्तुओं का संग्रह है.
सिंधिया ने रानी झाँसी का साथ नहीं दिया और अपनी सुख सुविधाओं का ध्यान रखा. बाद में उनके पुत्र माधव राव सिंधिया और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके द्वारा छोड़ी गई धन संपदा का उपभोग कर रहे हैं. लेकिन आज रानी झांसी का नाम जितने आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है उतना सिंधियाओं का नहीं.
मुझे फिल्म मुगलेआज़म का वो गाना याद आ रहा है जिस में कहा गया है
मोहब्बत हमने माना ज़िन्दगी बर्बाद करती है, ये क्या कम है कि मर जाने पे दुनिया याद करती है.
इसका अर्थ तो यही हुआ कि जिसे मर जाने के बाद दुनिया याद करे उसका ही जीवन सफल है.