जर्मन मूल की स्वतंत्र लेखिका मारिया वर्थ का एक विचारोत्तेजक लेख
यद्यपि मैं भारत में लम्बे अरसे तक रही हूँ लेकिन यहाँ की बहुत सी ऐसी बाते हैं जिनको समझने में मैं असमर्थ हूँ. उदाहरण के लिए जब भी किसी शिक्षित या पढ़े लिखे भारतीय के सामने भारत को एक हिन्दू राष्ट्र कहा जाता है तो वो नाराज़ क्यों हो जाता हैं?
भारत एक हिन्दू बाहुल्य देश हैं और अपनी प्राचीन हिन्दू संस्कृति और इतिहास के कारण, विश्व में एक विशिष्ट स्थान रखता है. हिन्दू संस्कृति ने सभी पश्चिमी देशों और विदेशियों को भारत की ओर आकर्षित किया है. फिर आखिर क्यूँ आज अनेक हिन्दू भारतीय अपने देश को हिन्दू राष्ट्र कहने और हिंदुत्व को स्वीकार करने में हिचकिचाते हैं. क्यों कुछ लोग ये मह्सूस करते हैं कि यदि भारतवासी हिंदुत्व के मूल्यों का अपनाएंगे तो ये खतरनाक बात होगी. क्या उन्हें इतनी समझ नहीं है.
उनकी ये धारणा दो कारणों से अजीब लगती है. पहला ये कि ऐसे शिक्षित भारतीयों को समस्या सिर्फ हिन्दू भारत से ही है, मुस्लिम या ईसाईयों से नहीं.
उदाहरण के लिए जर्मनी एक सेक्युलर देश है और इस देश की 59% आबादी दो बड़े ईसाई चर्चों, प्रोटेस्टेंट और केथोलिक के साथ रजिस्टर्ड है. सेक्युलर होते हुए भी इस देश को ईसाई देशो की श्रेणी में रखा जाता है और इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती.
हाल ही में चांसलर एंजिला मर्कल ने जर्मनी के ईसाई मूलक होने पर जोर दिया है और उन्होंने लोगों से ईसाई मूल्यों को फिर से अपनाने का आव्हान किया.
2012 में उन्होंने G-8 ग्रुप की बैठक में जाना इसलिए टाल दिया जिस से वो कैथोलिक दिवस पर जनता को संबोधित कर सकें.
जर्मनी की दो मुख्य राजनितिक पार्टियाँ अपने नाम के साथ क्रिश्चियन लगाती हैं जिन में एन्जिला मर्कल की क्रिश्चियन डेमोक्रेट यूनियन भी है.
यदि जर्मनी को ईसाई देश कहा जाए तो जर्मन लोग बुरा नहीं मानते. हालांकि यदि वो इसका बुरा भी मानें तो मैं समझ सकती हूँ क्योंकि चर्च का इतिहास बहुत ही भयावह रहा है. ईसाइयत की तथाकथित सफलता की कहानी उस समय की सरकार के उत्पीडन की कहानी है.
500 वर्ष पहले अमेरिका के मूल निवासियों के सामने केवल दो विकल्प रखे जाते थे ‘धर्म परिवर्तन कर लो या मौत को गले लगा लो.’
इसी प्रकार जर्मनी में 1200 वर्ष पहले जब सम्राट ‘कार्ल दी ग्रेट’ ने अपने जीते हुए इलाकों में बपतिस्मा न स्वीकार करने वालों को मृत्यु दंड का फरमान सुना दिया था.
इस पर उसके सलाहकार एल्कुन ने चिढ कर ये टिप्पणी की थी.
“किसी को बपतिस्मा स्वीकार करने के लिए तो मजबूर किया जा सकता है लेकिन ईसाई धर्म के सिद्धांतों में विश्वास करने के लिए कैसे मजबूर किया जाएगा.”
शुक्र है कि वो समय बीत चुका जब ईसाई धर्म के अपरिवर्तनीय या कट्टर सिधान्तों पर सहमत न होने पर, किसी का जीवन खतरे में पड़ जाता था. आज जो लोग इन सिद्धांतों से सहमत नहीं हैं वो लगातार चर्च को छोड़ कर जा रहे हैं. उन्हें चर्च के पदाधिकारियों के अनैतिक कार्य कलापों से बहुत घृणा हो गई है और उनका विश्वास इस धर्म के सिद्धांतों से उठ गया है. उदाहरण के लिए ‘’यीशु ही एकमात्र रास्ता है’’ और ये कि ‘ईश्वर उन सब को नरक में भेज देता है जो इसे स्वीकार नहीं करते.’
मैं भारत को हिंदुत्व से जोड़ने पर होने वाले विरोध को समझने में इसलिए भी असमर्थ हूँ कि हिंदू धर्म यहूदी, इस्लाम व ईसाई धर्म से बिलकुल अलग है. हिन्दू धर्म का इतिहास ईसाई और इस्लाम धर्म की तुलना में निसंदेह बहुत कम हिंसक है क्योंकि प्राचीन काल से इसका प्रचार-प्रसार तर्क/वितर्क एवं समझाइश द्वारा ही किया गया है, बलपूर्वक नहीं.
ये हिंदुत्व की धारणा नहीं है कि इसके सिद्धांतों का बिना सोचे समझे अन्धानुकरण किया जाए और अपनी बुद्धिमत्ता को ताक पर रख दिया जाए. इसके विपरीत हिन्दू धर्म तो ये कहता है कि आप अपने विवेक का पूरा इस्तेमाल करें और सोच समझ कर निर्णय लें.
हिन्दू धर्म किसी निर्मल एवं विद्वतापूर्ण चरित्र को सामने रख कर सत्य की खोज करता है. इस धर्म में प्राचीन साहित्य ग्रन्थ, वेद, उपनिषद भरे पड़े हैं जिनमें न केवल धर्म और दर्शन के बारे में, बल्कि नृत्य, संगीत, स्थापत्य कला, विज्ञान, खगोलशास्त्र, अर्थ शास्त्र और राजनीति पर भी विस्तृत जानकारी भरी पड़ी है.
यदि जर्मनी या अन्य किसी पाश्चात्य देश के पास साहित्य का ऐसा खजाना होता तो वो इस पर बहुत गर्व करते और हर अवसर पर अपनी महानता का दिखावा करते.
ये मैं इस लिए कह रही हूँ कि जब मैंने उपनिषदों का अध्ययन किया तो मैं स्तब्ध रह गई. यहाँ उन धारणाओं का बहुत स्पष्ट एवं विस्तार से बताया गया है जिनको मैं अपने अंतरज्ञान से सही महसूस तो करती थी लेकिन स्पष्ट बयान नहीं कर पाती थी.
हिन्दू दर्शन के अनुसार ब्रह्म अपूर्ण नहीं है. ब्रह्म अदृश्य है लेकिन हर वस्तु में, हर जगह पर उपस्थित है. इस परम सत्य को जानने और उस तक पहुँचने का अवसर हर किसी को बार बार मिलता है और वो उस तक पहुँचने के लिए अपना रास्ता चुनने को भी स्वतंत्र है. उस जिज्ञासु की सहायता के लिए उपयोगी संकेत तो उपलब्ध कराये जाते हैं लेकिन उन्हें किसी पर थोपा नहीं जाता.
भारत प्रवास के अपने शुरूआती दिनों में मैं ये समझती थी कि हर भारतीय अपनी परम्पराओं को जानता है और उनका सम्मान करता है. लेकिन धीरे धीरे मुझे ये पता लगने लगा कि मैं गलत थी.
भारत पर राज करने वाले ब्रिटिश शाषकों ने बड़ी कुशलता से भारत के अधिकांश अभिजात्य हिन्दू वर्ग को अपने परम्परागत सनातन मूल्यों से दूर ही नहीं कर दिया बल्कि उन्हें अपने परम्परागत मूल्यों से घृणा करना भी सिखा दिया.
इंग्लेण्ड में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीय, संस्कृत में लिखे हुए अपने साहित्य और ग्रंथों को पढने लायक नहीं रहे (क्योकि उन्होंने संस्कृत पढना छोड़कर अंग्रेजी पढना सीख लिया था). वो उसी बात को सही मानने लगे जो उन्हें उनके अंग्रेज मालिकों ने सिखाई थी. ज्ञान की कमी और अंग्रेजों द्वारा किये गए ब्रेनवाश के कारण बहुत से मॉडर्न या अभिजात्य हिन्दू, हिंदुत्व के अपने मूल्यों के खिलाफ हो गये.
पश्चिमी धर्मों में बिना किसी तर्क के विश्वास करना अनिवार्य है. यदि वे पूरी तरह इसे निषेध नहीं भी करते, तो भी अपने विवेक, अपनी बुद्धि से सोचने को हमेशा हतोत्साहित करते हैं. पश्चिमी धर्मों और हिन्दू धर्म में फर्क ये है कि हिन्दू धर्म बहु आयामी है और व्यक्ति को सोचने समझने की स्वतंत्रता देता है. लेकिन इस बात को ये अभिजात्य हिन्दू नहीं समझते.
बहुत से शिक्षित हिन्दू ये नहीं समझते कि जो लोग इस विशाल देश पर इस्लाम या ईसाई धर्म को थोपने के सपने देखते हैं, वो हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने के लिए उनकी तारीफ़ करते हैं. इस से एक निर्वात पैदा होता है जिस में पश्चिमी विचार और सिद्धांत आसानी से घुस कर अपनी पकड़ बना लेते हैं.
इसके साथ साथ बहुत से पश्चिमी विदेशी, जिन में कट्टर ईसाई भी शामिल हैं और जो हिन्दू धर्म और संस्कृति के महत्व को समझते हैं, भारत के विस्तृत ज्ञान के भण्डार से चोरी छुपी बहुत सा ज्ञान उठा लेते हैं और फिर बिना भारत का नाम लिए उसे अपनी खोज के रूप में निरुपित करते हैं या फिर कहते हैं कि ये ज्ञान तो उनके धर्म में बहुत पहले से था.
जब ये पश्चिमी लोग हिन्दू धर्म से बहुमूल्य ज्ञान उठा लेते हैं, तो उसके बाद जो शेष बचता है उसे घटिया समझा जाता है. अपनी नासमझी के कारण ये भारतीय इन पश्चिमी लोगो की सहायता करते हैं और इनफिनिटी फाउंडेशन के राजीव मल्होत्रा के अनुसार, हिन्दू धार्मिक सिद्धांतों को पश्चिम के विश्व कल्याण सिद्धांत ने हजम कर लिया है. इस तरह खाया गया हिरन (हिन्दु धर्म) तो दुनिया से गायब होता जा रहा है और उसको खाने वाला शेर और भी ताकतवर होता जा रहा है.
यदि मिशनरी हिन्दू धर्म को नीचा दिखाते है तो ये बात समझ आती है, क्योंकि उनका तो एजेंडा ही यही है और सूक्ष्मदर्शी हिन्दू इसे समझते हैं. लेकिन अफ़सोस की बात ये है कि हिन्दू नाम वाले भारतीय उन मिशनरियों की इसलिए मदद करते है क्योंकि वो हिन्दू धर्म को पश्चिमी धर्मों से घटिया मानते हैं. ऐसे लोग हिन्दू धर्म के बारे में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के बजाय इस धर्म से सम्बंधित हर चीज़ को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं. अधिकतर हिन्दू, धर्म के मूल्यों और परम्परा के बारे में बहुत कम जानते हैं और उन बातों को सच मानते हैं जो उन्हें अंग्रेजों ने सिखाई है.इस में मूर्ति पूजा और जातिवाद प्रमुख हैं.
ये लोग यह नहीं समझते कि उनका का कुछ नहीं जाएगा बल्कि उन्हें तो और लाभ होगा यदि वे दृढ़ता से समग्र हिन्दू परम्पराओं का समर्थन करेंगे.
कुछ समय पहले दलाई लामा ने कहा था कि जब वो जवान थे और ल्हासा में रहते थे, उन्हें भारत की वैचारिक सम्पन्नता ने बहुत प्रभावित किया था.
उन्होंने ये भी कहा कि भारत के पास विश्व का मार्गदर्शन करने की बहुत बड़ी क्षमता है.
इस बात को पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित अभिजात्य भारतीत कब समझेंगे.
मारिया वर्थ (जर्मन मूल की स्वतंत्र लेखिका)
~ Maria Wirth (freelance writer)
देवेन्द्र कुमार शर्मा द्वारा अनुवादित